
सोमवार, 10 अक्तूबर, 2005 को प्रकाशित
थोड़ी सी ताक़त मिलते ही हम दुनिया फ़तह करने के मंसूबे बाँधने लगते हैं. इसी अहम में कुदरत को कमज़ोर और बेबस समझ उसे रौंदने की हिमाकत करने से भी नहीं चूकते... पर भूल जाते हैं कि हर किसी के सब्र की इंतहा होती है. पिछले एक साल में पूरी दुनिया में कुदरत के क़हर से हुई तबाही के आंकड़ों ने हमें हमारी औकात बता दी है. ताज़ा भूकंप भी कुदरत को हमसे मिले दर्द की प्रतिक्रिया भर है. शशि सिंह, मुम्बई.
Monday, October 10, 2005
भारत और पाकिस्तान में भूकंप की त्रासदी
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